Sunday, 29 January 2017

एक संत की सीख A Motivational Story

एक संत की सीख  A Motivational Story

हमेशा की तरह सुबह जब नींद खुली तो खुद को कोस रहा था और साथ ही फिर से झूठे संकल्प करके अपने आप से झूठे वादे  कर रहा था,आखिर करता भी क्या ये तो रोज़ का किस्सा बन गया था.मैं रोज़ नये संकल्प करता था कि बस आज से शराब नही पीयूँगा और शाम के परवान चढ़ते ही मेरा वो संकल्प मानो कहीं खो जाता था.वही चंद बिगड़ैल शाहजादों की महफिलें और वही शराब की बोतलें अक्सर मेरे संकल्पों को चकनाचूर कर देती थी.और मैं बस उस नशे में डूबता जा रहा था सुबह जब आँख खुलती तो मेरे पास बाकी होते मेरे टूटे संकल्प।
जो मानो मेरे सामने खड़े होकर मेरी हरकतों पर मुझे खुद से नज़र मिलाने के लिये बोल रहें हों,और मैं चाहकर भी  खुद से नज़रें नही मिला पाता।
एक दिन फिर से ऑफिस से घर के लिये निकलने ही वाला था तभी ऑफिस के काफी पुराने गार्ड जिन्हें पूरा स्टाफ दीनू काका कहकर पुकारता था मेरे पास आये और बोले 
"मुझे पता है आप अपनी शराब की लत से बहुत परेशान हैं पर मैं एक बहुत पहुँचे हुये संत को जानता हूँ वो आपकी बहुत मदद कर सकते हैं और आप जैसे ना जाने कितने लोगों को वो सही राह दिखा चुके हैं "
बस मैने दीनू काका से उन संत का पता लिया और चल पड़ा उस आश्रम की ओर वहां पहुंचा तो उन संत को देखा एक अलग सा तेज और मंद सी मुस्कान थी उनके चेहरे पर,मैं जैसे ही उनके पास गया उन्होंने इशारे में मुझे बैठने के लिये कहा,मैं वहीँ बिछी हुई चटाई पर बैठ गया तब कुछ देर बाद उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले
           "बोलो बेटा क्यों इतने बेचैन हो?"
मैं बस एक साँस में सब बोलता चला गया और अपनी पूरी कहानी उन्हें बता दी,दिल हल्का सा महसूस हो रहा था मानो कोई बोझ सा उतर गया हो उन संत से अपनी कहानी बताकर,वो संत मेरी बात सुनकर मंद सा मुस्कुराये और फिर अचानक वहां से उठकर अंदर एक कक्ष की ओर जाने लगे मैं भी खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला
         "कुछ कहिये तो मैं क्या करूँ गुरु जी "
वो पीछे घूमे और बोले 
           "कल ठीक 9 बजे यहाँ आना तुम्हे अपने सवालों का जवाब मिल जायेगा "
"पर कल 10 बजे तो मेरी बहुत जरुरी मीटिंग है मुझे यहाँ कितना समय लगेगा क्या मैं मीटिंग के लिये लेट तो नहीं होऊंगा "
पर उन्होंने मेरी बात का जवाब नही दिया और कक्ष का द्वार बंद कर दिया।
मैं भी वहां से घर आ गया और रात को सोच लिया के सुबह जल्दी 7 बजे तक आश्रम पहुँचकर गुरु जी से मिल लूँगा, और अगली सुबह मैं जल्दी उठकर फटाफट तैयार होकर 7 बजे ही उन संत से मिलने आश्रम पहुँच गया वहां पहुंचा तो पता चला कि वो संत किसी साधना में व्यस्त हैं और 9 बजे मुझसे मिलेंगे। देखते ही देखते 9 भी बज गये पर वो संत वहां नही आये और फिर 9 से 10 मेरी मीटिंग टाइम भी निकल चुका था काफी जरुरी मीटिंग छूट चुकी थी मेरी, फिर सोचा अब तो अपने सवालों का जवाब लेकर ही जाऊंगा, और 10 से 11 फिर 11से 12 बज चुके थे.मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं उस बगीचे की ओर चल पड़ा जहाँ वो संत साधना कर रहे थे.वहाँ का नज़ारा देखकर मेरा पारा सातवे आशमान पर पहुंच गया.वो संत वहां एक आम के पेड़ को पकड़कर खड़े थे मानो उस पेड़ को अपनी बाँहों में भरकर खड़े थे. मैं उनके पास गया और गुस्से में बोला 
               "क्या आप मुझे बेवकूफ समझते हैं 9 से 12 बज  चुके हैं आपकी वजह से मेरी इतनी जरुरी मीटिंग भी छूट गयी और आप यहाँ इस पेड़ को पकड़कर खड़े हैं "
वो संत बोले "बेटा मैं क्या करूँ ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है,हर तरीका अपना लिया पर ये पेड़ मुझे छोड़ने के लिय तैयार ही नही "
मैंने बोला "क्या बच्चों जैसी बात कर रहे हो आप आपने इस पेड़ को पकड़ा हुआ है ना कि इस पेड़ ने आपको,आप इसे छोड़ दो आप खुद ही इससे छूट जाओगे "
उन संत ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराये और पेड़ से अपनी पकड़ ढीली करके मुझसे बोले 
"जैसे मैंने इस पेड़ को पकड़ा हुआ था ना की इस पेड़ ने मुझे,ठीक वैसे ही तुमने शराब को पकड़ रखा है ना की शराब ने तुम्हे, तुम इसे छोड़ दो तुम खुद ही इससे छूट जाओगे।"
मुझे मेरा जवाब मिल चुका था.मैं  कुछ कह ना सका और उन महान संत  पैरों में गिर गया। सच में उन संत की सीख से मेरा जीवन बदल गया.
दोस्तों ये तो एक कहानी मात्र थी पर आजकल ऐसे कई युवा हैं जो शराब नाम के इस जहर को रोज़ पीते जा रहें हैं और चाहकर भी इससे दूर जाने में नाकाम हैं. आशा करता हूँ इस पोस्ट को पढ़कर कई लोगों का मार्गदर्शन होगा।
धन्यवाद 
                                                                                       दो जरुरी बातें  जरूर  पढे 

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