Tuesday, 7 February 2017

वीरांगना तीलू रौतेली की गाथा Tale of Iron Lady Teelu Rauteli

वीरांगना तीलू रौतेली की गाथा  Tale of Iron Lady Teelu Rauteli


दोस्तों आपने वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के बारे में तो पढ़ा ही होगा, अटूट साहस और वीरता का दूसरा नाम रानी लक्ष्मी बाई था. अपने आज के इस post में हम एक ऐसी ही वीरांगना तीलू रौतेली के बारे में पढ़ेंगे,जो इतिहास के पन्नो में गढ़वाल की रानी लक्ष्मी बाई के नाम से हमेशा के लिये अमर हैं। 

वीरांगना तीलू रौतेली का जन्म लगभग सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गुराड गांव ( परगना चौंदकोट गढ़वाल ) में  वीर पुरुष भूप सिंह गोलार (रावत ) की पुत्री के रूप में हुआ। 
तीलू रौतेली बचपन से ही बहुत बहादुर और साहसी थीं, समय बीतता गया और जब तीलू 15 वर्ष की हुईं तो उनके पिता ने उनकी मंगनी इड़ा गांव पट्टी मोदाडस्यु के भुप्पा नेगी के साथ कर दी। 

इन्ही दिनों गढ़वाल पर कंत्यूरों द्वारा हमले किये जा रहे थे, इन्ही हमलों में उनके पिता, दोनों भाई, और उनके मंगेतर भुप्पा नेगी कंत्यूरों से युद्ध करते हुये वीरगति को प्राप्त हुये। 
कुछ समय बाद कांडा गांव में कौथीग ( मेला ) हो रहा था,तीलू ने अपनी माँ से कौथीग में जाने की जिद की तो उनकी माँ ने उन्हें कहा :
                                   "तीलू तुझे अपने पिता और भाईयों की बिलकुल याद नही आती, जा पहले अपने पिता और भाईयों की मौत का बदला ले दुश्मनो से फिर जाना कौथीग"
बस यही बात उस वीरांगना ने अपने जहन में बिठा ली और फिर अपनी 2 सहेलियों बेल्लु और देवली के साथ मिलकर एक नयी सेना का निर्माण किया, प्रतिशोध की आग ने तीलू को एक घायल शेरनी की तरह बहुत वीर और खतरनाक बना दिया। 
अपनी दोनों सहेलियों और अपनी घोड़ी बिंदुली के साथ अपनी पूरी सेना का मार्गदर्शन करते हुये तीलू रौतेली ने सबसे पहले खेरागढ़ ( कालागढ़ के पास ) को कंत्यूरों से आज़ाद कराया। उसके बाद उमटागढ़ी में भी तीलू रौतेली ने कंत्यूरों को धूल चटाई। फिर सल्ट महादेव में और उसके बाद भिलणभौंण की ओर अपना रुख किया और वहां भी कंत्यूरों को हार का स्वाद चखाया। इसी युद्ध में उनकी दोनों सहेलियां बेल्लु और देवली भी वीरगति को प्राप्त हुईं।
अपनी जीत और कंत्यूरों की हार के क्रम को यूं ही जारी रखते हुये तीलू रौतेली ने चौखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा स्थापित करने के बाद अपनी सेना के साथ देघाट वापस आने का निर्णय लिया।
उसके बाद कालिंकाखाल में फिर से कंत्यूरों को घुटने टेकने पर मज़बूर करने वाली वीरांगना तीलू रौतेली सराईखेत पहुंचीं और वहां एक बार फिर से कंत्यूरों का सफाया करके अपने पिता,भाईयों, और मंगेतर की मृत्यु का प्रतिशोध लिया।इसी युद्ध में दुश्मनों के वार से घायल होकर तीलू की घोड़ी बिंदुली ने भी प्राण त्याग दिये।
इस तरह कंत्यूरों को परास्त करके वापस लौटते हुये कांडा गांव के नीचे पूर्वी नयार नदी को देखकर तीलू रौतेली ने उस नदी के पास जाकर कुछ पल विश्राम करना चाहा और जैसे ही तीलू नदी के पास पहुंची वहां पहले से झाड़ियों के पीछे छुपे रामू रजवार नाम के हारी हुई कंत्यूरी सेना के एक सैनिक ने धोखे से तीलू पर पीछे से हमला करके मार दिया। और इस तरह वीरांगना तीलू रौतेली इतिहास के पन्नो में हमेशा के लिये अमर हो गयीं।

हमे ये जानकर बहुत गर्व है कि एक ऐसी वीरांगना जो 15 से 20 वर्ष की आयु में 7 युद्ध जीत चुकी थीं और संभवतः इतनी कम उम्र में ऐसा करने वाली दुनिया की एकमात्र वीरांगना है, वह तीलू रौतेली पूरे संसार में और इतिहास के पन्नो में गढ़वाल की रानी लक्ष्मी बाई के रूप में जानी जाती हैं। 

तीलू रौतेली की याद और सम्मान में आज भी कांडा गांव और बीरोंखाल के लोग हर साल कौथीग और ढोल दमाऊ के साथ उनकी प्रतिमा का पूजन करते हैं। 

हे वीरांगना तीलू रौतेली हम नमन करते हैं तेरे साहस को,तेरी वीरता को,तेरे उन धन्य माता पिता को जिन्होंने ऐसी वीरांगना को जन्म दिया, और नमन करते हैं गढ़वाल की तेरी उस जन्मभूमि को जहाँ तीलू रौतेली जैसी बेटियां पैदा होती हैं। 









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                                                                   धन्यवाद 
  

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